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मनोरमा :शानदार भाव भंगिमा के साथ अपनी अदाकारी में चार चाँद लगा देती थी
मनोरमा (16 अगस्त 1926 - 15 फरवरी 2008) बॉलीवुड में एक भारतीय चरित्र अभिनेत्री थीं,जिन्हें सीता और गीता (1972) औरएक फूल दो माली (1969) और दो कलियां (1969) जैसी फिल्मों में हास्य अत्याचारी चाची के रूप में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है ।
उन्होंने 1936 में लाहौर में बेबी आइरिस के नाम से एक बाल कलाकार के रूप में अपना करियर शुरू किया ।
इसके बाद, उन्होंने 1941 में एक वयस्क अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की, और 2005 में वाटर में अपनी अंतिम भूमिका निभाई , उनकाकरियर 60 वर्षों से अधिक का था। अपने करियर के माध्यम से उन्होंने 160 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। 1940 के दशक कीशुरुआत में नायिका की भूमिकाएँ निभाने के बाद, वह खलनायक या हास्य भूमिकाएँ निभाने लगीं। उन्होंने किशोर कुमार और महानमधुबाला के साथ हाफ़ टिकट जैसी सुपरहिट फ़िल्मों में हास्य भूमिकाएँ निभाईं । उन्होंने दस लाख , झनक झनक पायल बाजे , मुझेजीने दो , महबूब की मेंहदी , कारवां , बॉम्बे टू गोवा और लावारिस में यादगार परफॉर्मेंस दी ।
जन्म-एरिन इसहाक डेनियल
16 अगस्त 1926
लाहौर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
मृत्यु- 15 फरवरी 2008 (आयु 81)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
पेशा-अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष-1936–2005
जीवनसाथी-राजन हक्सर (तलाकशुदा)
बच्चे-रीता हक्सर
मनोरमा ने अपने करियर की शुरुआत 1936 में लाहौर में 'बेबी आइरिस' के नाम से की थी। उन्होंने 1941 में फिल्म वाटर, 2005 में अपनी अंतिम भूमिका के लिए एक अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की। उनका 60 वर्षों का सक्रिय करियर था जो अपने आप मेंएक महान चिह्न है। और अपने 60 साल के करियर में उन्होंने 160 फिल्में कीं। 1940 के दशक की शुरुआत में, वह एक प्रमुखअभिनेत्री के रूप में सामने आईं, लेकिन एक निश्चित समय के बाद, खलनायक या हास्य भूमिकाओं के लिए तय हो गईं।
उनकी उल्लेखनीय भूमिकाओं में से एक सुपरहिट फिल्म हाफ टिकट थी जिसमें उन्होंने बहुमुखी अभिनेता किशोर कुमार और सबसे सुंदरमधुबाला के साथ स्क्रीन साझा की थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि मनोरमा का असली नाम एरिन इसाक डेनियल था। उसकी माँआयरिश थी और उसके पिता एक भारतीय ईसाई थे, इसलिए वह आधी-आयरिश थी। उसके पिता एक इंजीनियरिंग कॉलेज मेंप्रोफेसर थे। मनोरमा न केवल एक शानदार अभिनेत्री थीं, बल्कि एक अद्भुत और प्रशिक्षित शास्त्रीय नर्तक और गायिका भी थीं। 1940 के दशक के दौरान, मनोरमा रेड क्रॉस, लाहौर में एक मंच कलाकार थीं। वह नौ साल की थी जब रूप के. शौरी ने उसे लाहौर के एकस्कूल संगीत समारोह में देखा। यही वह क्षण था जब उसकी नियति पूरी तरह से बदल गई थी, और वह इस बारे में अनजान थी।
उनके करियर की शुरुआत खजांची (1941) के साथ स्क्रीन नाम 'मनोरमा' के तहत एक बाल कलाकार के रूप में हुई थी। यह नामउन्हें खुद रूप के शौरी ने दिया था। इसके बाद, वह लाहौर में एक अत्यधिक भुगतान वाली अभिनेत्री के रूप में विकसित हुईं। भारतऔर पाकिस्तान के बंटवारे के बाद मनोरमा मुंबई आ गईं। वह अपने करियर को लेकर चिंतित थी क्योंकि उसके दिमाग में एक बात घूमरही थी कि शायद सब कुछ खत्म हो गया था और उसे शुरुआती बिंदु से शुरुआत करने की जरूरत थी। लेकिन नियति उसके पक्ष मेंथी। अभिनेता, चंद्रमोहन ने मनोरमा के पिछले कार्यों को देखने के बाद निर्माताओं से सिफारिश की। फिर उन्होंने फिल्म 'घर कीइज्जत' (1948) में काम किया, जिसमें उन्होंने दिलीप कुमार की बहन की भूमिका निभाई।
कुछ वर्षों के बाद, उन्होंने राजन हक्सर से शादी की और हास्य या खलनायक की भूमिकाओं के लिए तैयार हो गईं। शादी के कई सालोंबाद उनका हक्सर से तलाक हो गया। उनकी आखिरी हिंदी फिल्म अकबर खान की 'हड़सा' थी। इसके बाद उन्होंने फिल्मों से टीवी कारुख किया और पांच साल बाद दिल्ली आ गईं। उन्होंने एक टेलीविजन श्रृंखला 'दस्तक' में काम किया जिसमें शाहरुख खान भी थे। मनोरमा ने महेश भट्ट की जूनून (1992) के लिए भी शूटिंग की, लेकिन संपादन प्रक्रिया के दौरान, उनकी भूमिका को फिल्म से हटा दियागया। 2001 में, उन्होंने बालाजी टेलीफिल्म्स के काशी और कुंडली जैसे धारावाहिकों में काम किया। उनकी एक बेटी रीता हक्सरथी। उन्होंने सूरज और चंदा में संजीव कुमार के साथ काम किया, लेकिन बाद में उन्होंने एक इंजीनियर से शादी कर ली और खाड़ी मेंबस गईं।
2007 में उसे एक आघात हुआ, हालांकि वह ठीक हो गई लेकिन बोलने में गड़बड़ी और अन्य जटिलताओं से पीड़ित थी। 15 फरवरी, 2008 को मुंबई के चारकोप में उनका निधन हो गया। हर फिल्म में उनके मंत्रमुग्ध कर देने वाले अभिनय में उनकी यादों को संजोया जाएगा।
जब आग में कूदकर सुनील दत्त ने नर्गिस की बचाई थी जान, एक साल बाद हो गई थी दोनों की शादी
कॉलेज के दिनों में रेडियो के लिए काम करते हुए सुनील को नरगिस का भी इंटरव्यू लेने का मौका मिला. लेकिन उस समय एक मामूली शख्सियत होने के कारण घबराहट में सुनील उस समय की सबसे कामयाब एक्ट्रेस नरगिस से सवाल ही नहीं कर पाए. 1958 में इन्हें मदर इंडिया में साथ काम करने का मौका मिला.
फिल्म में तो दोनों मां-बेटे के रोल में थे, लेकिन सेट पर हुआ हादसा इन्हें करीब ले आया. सेट पर लगी आग में नरगिस फंस गईं औरसुनील कुछ सोचे बिना आग में कूदकर हीरो की तरह उन्हें बाहर निकाल आए. सुनील बुरी तरह झुलस गए लेकिन इस हिम्मत उन्होंनेनरगिस का दिल जीत लिया. एक साल बाद दोनों ने शादी कर ली.
प्रसिद्ध निर्देशक लेख टंडन की छोटी सी जीवनी
प्रसिद्ध निर्देशक लेख टंडन का जन्म 13 फरवरी 1929 - को हुआ था लेख टंडन के पिता फकीर चंद टंडन ने पृथ्वीराज कपूर के साथखालसा हाई स्कूल (लायलपुर, पंजाब, ब्रिटिश इंडिया) में पढ़ाई की थी, और उनके दोस्त थे। कपूर ने लेख टंडन को बॉलीवुड में कामकरने के लिए प्रेरित किया। लगभग उसी समय, लेख टंडन के भाई योगराज सहायक निदेशक और सचिव के रूप में रूप में पृथ्वी राजकपूर के साथ काम कर रहे थे लेख ने 1950 के दशक में हिंदी फिल्म उद्योग में सहायक निर्देशक के रूप में शुरुआत की और प्रोफेसर(1962 फिल्म) के साथ कई हिट फिल्मों के निर्देशक बन गए। हालांकि राजेंद्र कुमार और सायरा बानो अभिनीत प्रतिष्ठित फिल्म झूकगया आसमान बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई, समीक्षकों ने हालांकि उस फिल्म को क्लासिक्स फ़िल्म माना था बॉक्स ऑफिस परउनके सफल निर्देशन में राजकुमार (1969 की फिल्म), एक बार कहो, अगर तुम ना होते शामिल हैं उनकी सबसे चर्चित फिल्म राजेशखन्ना की मुख्य भूमिका वाली अगर तुम ना होते थी दुल्हन वही जो पिया मन भाये उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक थी औरफिल्म की नायिका रामेश्वरी ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि टंडन फिल्म के हर पहलू से जुड़े थे। उसने यह भी कहा कि यहफिल्म बिना किसी प्रचार के रिलीज हुई। अभिनेता विक्टर बैनर्जी, जिन्होंने उनकी फिल्म दूसरी दुल्हन में प्रमुख भूमिका निभाई,उन्हें एकबेहतरीन निर्देशक के रूप में वर्णित किया
उन्होंने अपने निर्देशन के प्रोफेसर (1962 की फिल्म), प्रिंस (1969 की फिल्म), एक बार कहो और अगर तुम ना होटे की सफलता केकारण राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। उनकी फ़िल्मों में आम्रपाली वैजयंती माला अभिनीत और अगर तुम ना होते राजेश खन्ना अभिनीतबेहतरीन क्लासिकल फिल्में थी
अगर तुम न होते फिल्म के लिए राजेश खन्ना को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला और टंडन को 1983 में फिल्मफैन्स एसोसिएशनअवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला। इसके बाद वे टीवी के नवजागरण पर चले गए और टीवी धारावाहिकों का निर्देशनकरने लगे। उनका पहला सीरियल भारत के राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल दूरदर्शन पर फ़िर वही तलाश थी शाहरुख खान को उनके टीवीसीरियल दिल दरिया में लेने का श्रेय लेख को दिया जाता है। उन्होंने 1990 के दशक की शुरुआत में दूरदर्शन पर प्रसारित टीवीधारावाहिक फरमान का भी निर्देशन किया।2000 के बाद, उन्होंने स्वदेस, रंग दे बसंती, चेन्नई एक्सप्रेस और चरफुटिया छोकरे जैसीफिल्मों में अभिनय किया।
उन्होंने अपनी फ़िल्म, दुल्हन वही जो पिया मन भाये, के लिए 1978 का फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार प्राप्त किया, जिसमेंव्रजेन्द्र गौर और मधुसूदन कालेकर थे।
वैजयंतीमाला और सुनील दत्त अभिनीत उनकी फ़िल्म आम्रपाली, सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए 39 वें अकादमी पुरस्कार के लिएनामांकित हुई
उन्हें 1983 में राजेश खन्ना अभिनीत फ़िल्म अगर तुम ना होते के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला।15 अक्टूबर 2017 कोनिर्देशक लेख टंडन साहब की मृत्य मुबई महाराष्ट्र में हो गई। लेख साहब को उनकी जयंती पर हार्दिक श्रद्धांजली 💐💐💐💐
1997 में रिलीज़ हुई वॉर-ड्रामा फिल्म से जुड़ी 20 ऐसी अनसुनी और रोचक
बॉर्डर’ (Border) 13 जून 1997 में रिलीज़ हुई थी. फिल्म में सनी देओल (Sunny Deol), जैकी श्रॉफ (Jackie Shroff), सुनीलशेट्टी (Suniel Shetty), अक्षय खन्ना (Akshaye Khanna), पुनीत इस्सर (Puneet Issar), कुलभूषण खरबंदा (Kulbhushan Kharbanda), तब्बू (Tabu), पूजा भट्ट (Pooja Bhatt) और राखी (Rakhee) जैसे कई बड़े सितारे नजर आये थे.
सनी देओल को पहली बार इस फिल्म में सरदार के किरदार में देखा गया था.
2. फिल्म का स्क्रीनप्ले और डायरेक्शन बॉलीवुड के जाने माने डायरेक्टर जे. पी. दत्ता (J. P. Dutta) ने किया था. साथ ही फिल्म कोप्रोड्यूस भी जे. पी. दत्ता ने ही किया था.
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3. ‘बॉर्डर’ फिल्म की कहानी साल 1971 में हुए भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध (Battle of Longewala) पर आधारित थी, जिसमे इंडियन आर्मी ने पाकिस्तान की सेना को धूल चटाई थी.
4. भारत-पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध में इंडियन आर्मी की तरफ से कुलदीप सिंह चंद्रपुरी (Kuldip Singh Chandrapuri) लीडररहे थे, जिन्हें बाद में भारत सरकार की तरफ से महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित भी किया था. फिल्म में सनी देओल ने इन्ही का रोलनिभाया था.
5. बता दें, यह फिल्म जे. पी. दत्ता का ड्रीम प्रोजेक्ट थी. उन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट सितंबर 1995 में लिखनी शुरू की थी और यहअप्रैल 1996 में कम्पलीट हो गई थी.
इस फिल्म की अधिकांश शूटिंग बीकानेर में हुई थी, जहां असलियत में भारत और पाक के बीच युद्ध हुआ था.
6. फिल्म की शूटिंग के दौरान रियल इंडियन आर्मी के जवान दिखाए गये थे. साथ ही फिल्म में किरदारों की वर्दी, इक्विपमेंट, जीप, टैंकऔर गन भी इंडियन आर्मी की तरफ से ही प्रोवाइड कराई गई थी.
7. बता दें, जे. पी. दत्ता के भाई दीपक दत्ता (Deepak Dutta) भी आर्मी में थे. साल 1987 में एक विमान दुर्घटना में उनका देहांत होगया था. फिल्म की शूटिंग के दौरान जैकी श्रॉफ ने दीपक दत्ता की ही वर्दी पहनी थी.
इस बारे में जे. पी. दत्ता ने खुद खुलासा किया था और बताया था कि उन्होंने जैकी श्रॉफ से पूछा था कि उन्हें उनके भाई की वर्दी पहनने मेंकोई एतराज तो नहीं है. इस पर जैकी श्रॉफ ने तुरंत हां कर दी थी.
8. इस फिल्म की रिलीज़ के समय साउथ दिल्ली के उपहार सिनेमा में एक ट्रेजेडी हो गई थी. दरअसल पहले ही दिन पहले शो के दौरानशोर्ट सर्किट की वजह से सिनेमा में आग लग गई थी, जिसकी वजह से 59 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल होगए थे.
9. इस फिल्म का म्यूजिक अनु मलिक (Anu Malik) ने कंपोज़ किया था. फिल्म में कुल 5 गाने थे और सभी गाने सुपरहिट हुए थे. खासकर फिल्म का फिल्म का गाना ‘संदेसे आते हैं’ (Sandese Aate Hain) उस साल ब्लॉकबस्टर हुआ था. बल्कि यह गाना आजभी दर्शकों को खूब पसंद आता है.
ता दें, इस गाने की वजह से सोनू निगम (Sonu Nigam) रातों रात बड़े सिंगर बन गए थे और इस फिल्म के बाद उन्हें लगातार कई बड़ीफिल्मों के ऑफर भी आने लग गए थे.
10. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ऑलटाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी. इतना ही नहीं यह साल 1997 में रिलीज़ हुई सबसे ज्यादाकमाई करने वाली दूसरी बॉलीवुड फिल्म भी बनी.
11. आइये ‘बॉर्डर’ फिल्म के बजट और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के बारे में बात कर लेते हैं.
Border Movie...
आई एस जोहर : हिंदी सिनेमा के प्रतिभावान और कलाकारों में से एक
फ़िल्म 'शागिर्द' में जॉय मुखर्जी के साथ उनकी अधेड़ उम्र के आशिक़ की भूमिका आप लोगो को शायद याद होगी
फ़िल्म के प्रसिद्ध गीत 'बड़े मियां दीवाने, ऐसे न बनो / हसीना क्या चाहे हमसे सुनो' के बजते ही जोहर का चेहरा नज़र आने लगता है. जौहर साहब सबसे पहले एक मशहूर फ़िल्म कलाकार, जो कभी फ़िल्म का हीरो तो कभी हास्य अभिनेता की तरह पर्दे पर नज़र आता. लेकिन पर्दे से परे वे लेखक, निर्माता-निर्देशक भी थे. हिंदी सिनेमा के हरफ़न मौला.कलाकारों में से एक थे आई एस जोहर. जिनका पूरानाम इन्द्र सेन जोहर.था इनका जन्म पंजाब के चकवाल जिले की तलागंग तहसील (अब पाकिस्तान में) 16 फरवरी 1920 को हुआ था
असल में उनके फ़िल्मी सफर की शुरूआत ही प्रसिद्ध निर्माता- निर्देशक रूप के शोरी की फ़िल्म 'एक थी लड़की' के लेखक के तौर परही हुई. इसी फ़िल्म में हास्य अभिनेता मजनू के साथ जोड़ी बनाकर एक भूमिका भी निभाई. अगले 35 बरस तक जोहर पर्दे पर लगातारछाए रहे.आईएस जोहर को जॉनी मेरा नाम फ़िल्म में तिहरी भूमिका के लिए फ़िल्म फ़ेयर अवॉर्ड मिला था.
दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना, जॉय मुखर्जी जैसे कई सितारों के साथ हास्य भूमिकाओं के अलावा किशोर कुमार केसाथ 'बेवकूफ' (1960), 'अकलमंद' (1966) और 'श्रीमान जी' (1968) और महमूद के साथ 'जोहर महमूद इन गोआ' (1965), 'जोहर - महमूद इन हांगकांग ' (1971) में जोड़ी बनाकर मुख्य भूमिकाओं में भी काम किया.
अपनी फ़िल्म 'जोहर महमूद इन गोआ' की कामयाबी से इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने अपने ही नाम से दो और फ़िल्में 'जोहर इनकाश्मीर' (1966) और 'जोहर इन बाम्बे' भी बना डाली. दोनो ही फ़िल्में फ्लॉप हुईं.
अलबत्ता विजय आनंद के निदेशन में बनी सुपर हिट फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' (1970) में अपनी तिहरी हास्य भूमिका के लिए उन्हेंफ़िल्मफेयर अवार्ड ज़रूर मिला. इस फ़िल्म में उनके तीनों रूप ‘पहलाराम', ‘दूजाराम' और 'तीजाराम' आज भी दर्शकों के दिलों में आजभी ज़िंदा हैं.
मगर फ़िल्मों में अभिनय करने भर से कोई हरफ़न मौला कहलाने का हक़दार नहीं हो जाता.
उसके लिए बहुत कुछ ऐसा करना होता है जो अमूमन नहीं होता.. अब जैसे आईएस जोहर ने दो बार एमए किया. पहली बार अर्थशास्त्रमें, दूसरी मर्तबा राजनीति शास्त्र में.
फिर भी दिल नहीं माना तो वकालत की डिग्री हासिल करने के लिए एलएलबी भी कर डाला.
पेशा चुनने का मौका आया तो पेशा इख्तियार किया फ़िल्म लेखक और अभिनेता का पहला कदम सही पड़ा तो फिर डायरेक्टर भी बनगए.
उन्होंने उम्र भर अनगिनत इश्क़ किए और शायद आधा दर्जन शादियां भी कीं. पहली पत्नी रमा बंस से भले ही आख़िर तक प्रेम का नाताबना रहा लेकिन अलगाव काफ़ी पहले हो गया था.
फिर उनकी ज़िंदगी में प्रोतिमा बेदी भी आईं. प्रसिद्ध कैमरामैन जल मिस्त्री की पत्नी को भी वे एक क्रिकेट मैच देखते-देखते ले उड़े.
याद पड़ता है कि एक बार बातचीत में उन्होंने बताया था कि जब वे लाहौर के एफसी कालेज में छात्र थे तो कोई लड़की उन्हें घास नहींडालती थी.
वजह यह कि उस वक़्त वे काफ़ी दुबले-पतले थे और हड्डियों का ढांचा भर नज़र आते थे.
अपनी इसी कमज़ोरी को ढकने के लिए और लड़कियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उन्होंने लिखना शुरू कर दिया. पहले कुछलेख और फिर नाटक लिखना शुरू किया.
ज़ाहिर है कि वे अपने मक़सद में कामयाब हुए. 'कामयाब न होता तो लिखता ही क्यों रहता?' उन्होंने कहा था.
उनकी शुरुआती फ़िल्में उनके इस बयान की ताईद करती हुई लगती हैं. साठ के दशक में कामयाबी की चर्बी जिस्म पर चढ़ी तो हुलियाकुछ बेहतर हुआ.
वर्ष 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध फ़िल्म वालों ने जनता पार्टी को मदद की. जब जनता सरकार ने भी निराश किया तोजोहर के निशाने पर समाजवादी नेता राज नारायण आ गए, जो उस समय सरकार में मंत्री भी थे.
जोहर जब-तब उनको अपने बयानों से छेड़ते थे. उन्होने घोषणा कर दी कि जहां से भी राज नारायण चुनाव लड़ेंगे वे उनके विरुद्ध खड़ेहोंगे.
नेताजी के नाम से लोकप्रिय राजनारायण जी उनसे काफ़ी परेशान रहे. यह और बात है कि फ़िल्मों में उनकी कॉमेडी पर हंसने वालों नेचुनाव में उनको कभी गंभीरता से नहीं लिया. यह भी सच है कि वे ख़ुद भी अपने चुनाव को गंभीरता से नहीं लेते थे.
अंग्रेज़ी फ़िल्म पत्रिका 'फ़िल्मफेयर' में उनका सवाल-जवाब का कॉलम ‘क्वेश्चन बाक्स' बेहद पापुलर था. 1978 में जब मेनका गांधी ने'सूर्या' नाम से एक पत्रिका शुरू की तो उसमें आईएस जोहर का एक कॉलम भी छपता था 'री-राईटिंग आफ़ द हिस्ट्री' जिसमें वेतात्कालिक राजनतिक-सामाजिक घटनाओं पर व्यंग लिखते थे.
उन्होने ख़ुद को भले ही कभी गंभीरता से न लिया हो लेकिन हॉलीवुड ने उनको बड़ी गंभीरता से लिया. इसी कारण उनको 'हैरी ब्लैक' (1958), 'नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर' (1959), 'लारेंस आफ़ अरेबिया' (1962) और 'डेथ आन द नाईल' (1978) जैसी फ़िल्मों में कास्टकिया.
जिस वक़्त पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक़ ने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो का तख़्तापलट कर फांसी देने का षड़यंत्र रचा तब इस विषयपर आईएस जोहर ने एक नाटक लिखा था 'भुट्टो' जो बहुत चर्चित भी हुआ और प्रशंसा भी पाई. इस नाटक के अलावा जोहर ने लगभगएक दर्जन और भी नाटक लिखे लेकिन वे इतने चर्चित नहीं हुए.
10 मार्च 1984 को सात महीने की लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया. मरने से पहले तक उनके सेंस आफ ह्यूमर में कोई कमीनहीं आई.
मृत्यु के दो-तीन दिन पहले उन्होंने अपने बेटे अनिल और बेटी अंबिका को बुलाकर कहा था- 'मेरे मरने की ख़बर छपे तो मुझे अख़बारभेजना मत भूलना '.मगर जाने से पहले अपने कारनामों की बदौलत एक यादगार इंसान बन गए. बॉलीवुड के ऐसे विरले कलाकारआईएस जौहर साहब को सादर अभिवादन 🙏🙏🙏
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